Tuesday, 8 November 2016
Saturday, 5 November 2016
हज के पांच दिन
अल्ला हुम्मा लब्बैक
बैतुल्लाह जाने वाले तमाम
हुज्जाज़े कराम से गुज़ारिश है की वह अल्लाह के घर का दीदार करने के लिए जब अपने
घरों से निकलें तो दिलों दिमाग की सारी कदूरत को पाक साफ़ कर लें. सिर्फ अल्लाह की
रजा और उस की मखलूक की फलाह के लिए अपने साथ पैग़ामे मुहब्बत ले जाएँ और अपने हज के
साथ अमन का पैगाम लायें. बैतुल्लाह में हर कदम पर आप की ज़बान से “अल्ला हुम्मा
लब्बैक” का विर्द और ज़िक्रे इलाही जारी रहे. आप अल्लाह के मेहमान हैं इस लिए
मेरी आप से गुज़ारिश है की आप अपने लिए अपनी क़ोम के लिए और अपने वतन के लिए और पूरी
उम्मते मुस्लिम के लिए ख़ुसूसी दुआएं करें.
इस के साथ हज के ख़ास आमल का
मुताला करते रहें. ताकि आपका हज मक़बुलियत का दर्जा हासिल कर सके. इस सिलसिले में
इस नाचीज़ को भी अपनी दुआओं में याद रखें.
यह बात ज़रूर आप के ज़हन में
रहे की अल्लाह ताआला ने हज को जाने वालों को बतौरे ख़ास क़ुरआने पाक में हिदायत दी
है की कोई बुरी बात न करें. कोई बे अमली न करें, और किसी किस्म का झगडा न करें.
जहाँ तक मुमकिन हो सके तमाम वक़्त खुदा के अहकाम के मुताबिक गुजारें. हज का सफ़र कोई
तफरीह का सफ़र नहीं है. ये तो आप की तमन्नाओं और दुआओं का नतीजा है. जिस सफ़र के लिए
आप दूसरों से भी दुआएं करातें हैं. अब उस
सफ़र का वक़्त आ गया है.
Ø तो फिर क्यों रो रहे हो?.
Ø क्यों बच्चों और रिश्तेदारों की तरफ से हसरत भरी नजरों से
देख रहे हो?.
Ø क्यों उन को गाड़ियों में भर भर के एअरपोर्ट ले जा रहे हो?.
Ø सब से मुंह फेर कर जल्दी से जहाज़ में क्यों नहीं जाते?.
तुमने जो हलाल कमाई इस सफ़र के लिए जमा की थी उस पर एक बार
फिर नज़र डाल लो. कोई नाजायज़ माल तो इस में शामिल नहीं है. इस लिए की हराम माल से
किया हुआ हज कुबूल नहीं होता. हलाल माल से हज करने वाले के लिए हदीस में है की हज
करने वाला चार सौ आदमियों की अपने रिश्तेदारों में से क़यामत के दिन शफाअत करेगा और
वह अपने गुनाहों से इस तरह पाक हो जाता है जैसे की आज ही पैदा हुआ है. इस बात का ख्याल रहे
अल्लाह की राजा के लिए एक दुसरे से मुहब्बत रखें. नाफ़रमानी से बचते रहें. बहुत से
हाजी इस बात को भूल जाते हैं की मोमिन को तकलीफ पहुँचाना हराम है. और हजरे असवद का
बोसा लेना, जम जम का पानी पीना और दो रकात मकामे इब्राहीम पर पढना ये सारे काम
सुन्नत हैं. आप क्यों सुन्नत को अदा करने के लिए हराम काम करते हो. इस लिए किसी भी
मुसलमान को तकलीफ देने से बचना इस सफ़र में बहुत ज़रूरी है. एक और बात काबिले लिहाज़
रहे की इस सफ़र की दुश्वारियों, तकलीफों और बिमारियों को अपने गुनाहों का कफ्फारा
समझें. अगर कोई सहूलत हज कमिटी या हुकूमते सउदिया की जानिब से मिलने में कोताही हो
तो उस पर सब्र करें. ये सफ़र आशिकाना और वालिहना सफ़र है. और आशिक माशूक की तलब के
सफ़र में शिकायत नहीं करता. किसी भी तरह की तकलीफ आने पर सहाबा कराम और बुजुर्गों
के वाकियात याद करें. उन्होंने पैदल हज किया. पैरों में कांटें चुभे, नंगे पैर
चलते थे कहीं नबी के निशाने क़दम पर मेरा जूता न रखा जाए. बस अपने गुनाहों की मुआफी
के लिए इस्ताग्फार करते हुए चलें. और ये तसव्वुर रहे की एक कैदी है जो बख्शीश के
लिये बख्शने वाले बादशाह के सामने पेश हो रहा है. बैतुल्लाह शरीफ को देखते वक़्त ख़ास
कर पहली नज़र पड़ने पर दुआ कुबूल होती है. मगफिरत और मुकम्मल तौर पर दीं पर चलने की
दुआ मांगे उस वक़्त इस खादिम को भी याद रखें.
खादिम-ए-हुज्जाज
शहादत अली निजामी
रियाज़ अली निजामी
रियाज़ अली निजामी
सदर: बज्म-ए-सादिक, खयाला, नयी दिल्ली
9213737885
Ø
उमरे का इहराम हो तो नियत करें.
अल्लाह हुम्मा इन्नी अरिदुल
उमरा फयस्सर हाली वतक़ब्बल्हा मिन्नी.
तर्जुमा : ऐ अल्लाह नियत करता हूँ उमरे की इस को मेरे लिए
आसन फरमा दीजिये और कुबूल फरमा लीजिये.
Ø
अगर हज और उम्रे का इहराम हो तो यूँ नियत करें.
अल्लाह हुम्मा इन्नी अरिदुल हज वल उम्रतह फयस्सर
हुमाली वतक़ब्बल हुमा मिन्नी.
तर्जुमा : ऐ अल्लाह
नियत करता हूँ हज और उमरे की दोनों को मेरे लिए आसन फरमा दीजिये और कुबूल फरमा
लीजिये.
Ø
अगर हज का इहराम हो तो यूँ नियत करें.
अल्लाह हुम्मा इन्नी अरिदुल
हज वल उम्रतह फयस्सिरली वतक़ब्बल हुमा मिन्नी.
तर्जुमा : ऐ अल्लाह हज की नियत करता हूँ इसे मेरे लिए आसान
फरमा दीजिये और कुबूल फरमा लीजिये.
नियत अरबी में हो या उर्दू किसी भी ज़बान में कर सकते हैं.
अल्लाह सब ज़बानों का जानने वाला है. और दिलों का हाल बखूबी जनता है.
Øउस के बाद बुलंद आवाज़ से तीन मर्तबा तल्बिया पढ़ें.
लब्बैक अल्ला हम्मा लब्बैक,
लब्बैक ला शरीक लका लब्बैक, इन्नल हम्दा वन्निअ मता लका वल्मलकू ला शरीक लक.
तर्जुमा : हाज़िर हूँ ऐ अल्लाह हाज़िर हूँ आप का कोई शरीक
नहीं हाज़िर हूँ.
अहराम : अहराम के मानी हरम करना. हाजी जिस वक़्त हज की नियत कर के तलबिया यानी लब्बैक
पढ़ लेता है तो उस पर चन्द हलाल और मुबाह चीज़ें भी अहराम की वजह से हराम हो जाती
हैं. इसी लिये इसे अहराम कहते हैं. उन दो चादरों को भी अहराम कहते हैं जिन को हाजी
हालते अहराम में इस्तेमाल करता है.
फ़राइज़-ऐ-उमरा : उमरे में दो फ़र्ज़ हैं : एक अहराम, दूसरा तवाफ़. अहराम के लिए तलबियाह और नियत
दोनों फ़र्ज़ हैं, और तवाफ़ के लिए सिर्फ नियत फ़र्ज़ है.
वाजिबात-ऐ-उमरा : सफा और मरवा के बीच सई करना. सर के बाल मूंडाना या कटवाना.
उमरा करने का तरीका : उमरा के लिए मीकात से पहले उमरे का अहराम बांधें और अहराम की हालत में जिन
चीज़ों को मना किया गया है उन से बचें. मक्का मुकर्रमा में आदाब को मल्हूज़ रख कर
मस्जिद-ऐ-हरम में बाबुस्सलाम से दाखिल हों और फिर रमल और इजतिबा के साथ तवाफ़ करें
और जब हजरे अस्वाद का पहला इस्तिलाम करें तो तल्बिया बंद कर दें और तवाफ़ के बाद दो
रकात नफ्ल पढ़ कर आबे जमजम पियें. हजरे अस्वद का इस्तिलामकर के फिर बबुस्सफा से
निकल कर सई करें. दुआ करें, फिर सर के बाल मुंडवाये या कसर कराएं. अब आप हलाल हो
गए और उमरा भी हो गया. अल्लाह तआला कुबूल फरमाए.
.......आमीन.
अक़साम-ऐ-हज : हज की तीन किसमें हैं, अफराद, किरान और तमात्तो (फ़क़त हज का अहराम बंधना).
इस को इफराद कहते हैं, हज और उमरे का एक साथ अहराम बंधना उस
को किरान कहते हैं, अव्वल हज के महीनों में उमरा करें फिर घर गए बिना उसी साल हज
का अहराम बाँध कर हज करें इस को तमत्तों कहते हैं हाजी आम
तौर से तीसरी किस्म यानी हज्जे तमत्तों करते हैं यही सब से आसान है.
फ़राइज़-ऐ-हज : हज के तीन फ़र्ज़ हैं. अहराम बंधना, मैदान-ऐ-अराफात में ठहरना
और तवाफे जियारत करना.
फ़राइज़-ऐ-हज : हज के दो रुक्न हैं. तवाफ-ऐ-जियारत, मैदाने अराफात में ठहरना. इस में अहम्
अराफात में ठहरना है.
वाजिबात-ऐ-हज : मुज्दल्फा में ठहरना, रमी जीनार यानी कंकरी मारना, और तमत्तू को कुर्बानी
करना. हलक यानी सर के बाल कटवाना, सफा और मरवा के बीच सई करना, आफाकी यानी मीक़ात
से बाहर रहने वाले को तवाफे विदा करना.मुज्दल्फा में मगरिब और ईशा की नमाज़ एक साथ
पढना. रमी ज़मार कुर्बानी और हलक़ में तरतीब रखना, यानी पहले कंकरी मारना फिर
कुर्बानी करना और उस के बाद सर के बाल कटवाना.
हज के पांच दिन : मक्का मुकर्रमा से मिना जाना, आठवी ज़िल्हिज्जा को तमत्तो और
अहले मक्का को हज का अहराम बांधना चाहिए. उस से पहले भी बंधना जायज़ है. जब अहराम
वगैरह का इरादा हो तो गुस्ल वगैरह कर के दो रकात नफ्ल नमाज़ पढ़ कर अहराम की नियत
करें. आठवी तारीख को अहराम बंधने वाला अगर हज की सई तवाफे ज़ियारत से करना चाहे तो
उस को चाहिए एक नफ्ली तवाफ़ इज्तिबा और रमल के साथ करे. और उस के बाद सई करे. यह हज
की सई हो जाएगी और फिर दसवीं तारीख को सई ना करे. मगर अफज़ल ये है की सी तवाफे
ज़ियारत की बाद मक्का मुकर्रमा से मिना को चले और रात को मिना में ही क़याम करे. आज
कल मल्लिम हजरात आठवीं ज़िल्हिज्जा को रात ही में मिना ले जाना शुरू कर देते हैं.
मिना में जाकर जोहर, असर, मग़रिब, ईशा और फज़र पांच नमाज़ें पढनी मुस्तहब हैं. रात को
मिना ही में ठहरना चाहिए, मक्का मुकर्रमा या किसी और जगह ठहरना सुन्नत के खिलाफ
है. मिना में कोई ख़ास हुक्म नहीं है. सिर्फ कायम और पांच नमाज़ें पढना सुन्नत है.
मिना से अराफात में जाना : नवी ज़िल्हिज्जा को फज़र की नमाज़ ख़ूब उजाले में पढ़ें. जब सूरज निकल आये अराफात
को चले. बहुत से हाजी सुबह सादिक से पहले ही जाना शुरू कर देते हैं. ये सुन्नत के
खुलाफ है. रस्ते में खुशु और खुजू के साथ चलें. जिक्रो अज्कार और तल्बिया पढ़ते हुए अराफात में दाखिल
हों. नवी तारीख को ज़वाल के बाद से दसवीं की सुबुह सादिक किसी भी वक़्त उस में ठहरना
रुक्ने आज़म है. नवी ज़िल्हिज्जा को ज़वाल से ले कर सूरज गुरुब होने तक अराफात में
रहना वाजिब है. जब ज़वाल का वक़्त हो जाए वुजू करें गुस्ल अफज़ल है और इत्मीनान व्
सुकूने कल्ब के साथ अपने रब की तरफ मुतवज्जह हों. ज़वाल होते ही या इस से पहले
मस्जिद-ऐ-नमरह पहुँच जाएँ. जोहर और असर जोहर के वक़्त में एक अज़ान और दो तकबीर के
साथ इकटठी पढी जाती हैं इन के जमा करने में मुकीम और मुसाफिर दोनों बराबर हैं. अगर
मस्जिद-ऐ-नमरा नहीं जा सकते तो अपने खेमें में मुसाफिर हैं तो कस्र करें और मुकीम
हैं तो पूरी नमाज़ अपने अपने वक़्त में अदा करें. जब नमाज़ पढ़ चुकें तो मग़रिब तक वकूफ
करें. उस दौरान ज्यादा से ज्यादा वक़्त दुआ में सर्फ़ करें. एक रिवायत में है की जो
मुसलमान अरफा को ज़वाल ऐ बाद वूकूफ़ करे और किबला रुख हो कर सू मर्तबा चौथा कलमा पढ़े
उस के बाद सुरे इख्लासफिर सौ मर्तबा दुरुद शरीफ पढ़े तो अल्लाह तआला फरमाते हैं ऐ
मेरे बन्दों क्या जज़ा है मेरे उस बन्दे की जिस ने मेरी तस्बीह बयान की और मेरी
बधाई बयान की और मेरे नबी पर दुरुद भेजा, मेने उस को बख्श दिया और उस की शफाअत को उस
के नफस के बारे में कुबूल किया और अगर मेरा बन्दा अहले वुकूफ की भी शफाअत करे तो
में कुबूल करूँगा.
मुज्दल्फा से मिना को जाना : दस ज़िल्हिज्जा यानी १० तारीख को सूरज निकलने से पहले मुज्दल्फा से मिना को
चलें और जमरते उखर की रमी करें. दसवी तारीख का रमी का वक़्त सुबह सादिक से ग्यारहवी
की सुबह सादिक तक है.मस्नूं वक़्त दसवीं तारीख को सुरज निकलने से ज़वाल तक है. दस
तारीख को जब मिना में आयें तो पहले और दुसरे जमरात को छोड़ कर सीधे तीसरे जमरात पर
आये और उस जमरात पर पहली कंकरी मरते ही तल्बिया बंद कर दें.उस के बाद कुर्बानी कर
के सर के बाल मुंडवा कर या कटवा कर अहराम खोल दें. और उस के बाद तवाफ़-ऐ-ज्यारत
करें. फिर मिना जा कर ग्यारह तारिख को ज़वाल के बाद जोहोर की नमाज़ पढ़ कर तीनों
जमरात पर सात सात कंकरी मारें. ग्यारह बारह तारीख को रामी का वक़्त ज़वाल के वक़्त से
सुबुह सादिक तक रहता है. गुरुब से सुबह सादिक तक मर्दों के लिए मकरूह है. रमी से
फ़ारिग होकर बारह तारीख को मक्का मुकर्रमा आयें. अगर दस तारीख को तवाफ़-ऐ-ज्यारत
नहीं किया तो ग्यारह को कर लें. अगर ग्यारह को भी नहीं किया तो बारह को मग़रिब से
पहले पहले कर लें. ये तवाफ़ किसी भी वक़्त किया जा सकता है.अब मुकम्मल हज हो गया है.औरत
और मर्द दोनों के लिए रमी के अहकाम बराबर है,अलबत्ता औरत को रात में रमी करना अफज़ल
है. कमज़ोर और बूढ़े मर्द भी रात में रमी कर सकते हैं. अगर बारह तारिख को मक्का
मुकर्रमा जाने का इरादा है. तो मिना से सूरज गुरूब होने से पहले निकल जाएँ.
मिना से तवाफ़-ऐ-ज्यारत के
लिए जाना : रमी, कुर्बानी और हजामत से फरिग होने के बाद
तवाफ़-ऐ-ज्यारत करें. यह तवाफ़ रुक्न भी है और फ़र्ज़ भी. यह दस तारिख को करना अफज़ल
है. और बारहवी तारिख को सूरज गुरुब होने से पहले जायज़ है. उस के बाद किया जाए तो
दम वाजिब हो जाता है.
नोट : हज के लिए जाने वालों को चाहिए की हज पर रवाना होने से पहले ही किसी आलिम से
हज का पूरा तरीका सीखें तमाम हाजियों से दरखास्त है जहाँ कहीं भी लोग अपने
जान-ओ-माल से हाजियों की खिदमत कर रहें हैं उन को भी अपनी ख़ुसूसी दुआओं में याद
रखें.
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